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अब भाईजान की नो एंट्री; गरबा में मुस्लिमों की एंट्री पर विवाद: आईडी कार्ड और गंगाजल से मिलेगी अनुमति”|

गरबा में ‘नो एंट्री’, आईडी कार्ड और गंगाजल जैसे नियमों को लेकर हाल ही में देशभर में गहरा विवाद खड़ा हो गया है। नवरात्रि के इस धार्मिक पर्व पर विभिन्न राज्यों—खासकर मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र व राजस्थान—में गरबा आयोजनों के नियम इतने सख्त कर दिए गए हैं कि इसमें सहभागिता को लेकर बहस छिड़ गई है।

विवाद की वजह और नियम

  • कई गरबा आयोजकों व हिंदू संगठनों ने गैर-हिंदुओं—खासतौर पर मुस्लिम युवकों—की एंट्री पर प्रतिबंध की मांग की है। इसके लिए प्रवेश पर आईडी कार्ड दिखाना अनिवार्य कर दिया गया है।
  • कई जगहों पर गंगाजल पिलाना, तिलक लगवाना, कलावा बांधना और मंदिर के बाहर भगवान की प्रतिमा अथवा फोटो के आगे पूजा/आरती करवाना भी अनिवार्य किया गया है।
  • आयोजकों को सीसीटीवी, फर्स्ट एड, अग्निशमन, आपात-निकासी और बिजली बिल का वैध प्रमाण भी जरूरी कर दिया गया है।

नियमों के पीछे तर्क

  • हिंदू संगठनों का तर्क है कि ‘लव जिहाद’ की घटनाओं और सांस्कृतिक सुरक्षा के हवाले से ये कदम उठाए गए हैं, जिससे हिंदू लड़कियां सुरक्षित रहें और कोई विवाद न हो।
  • आयोजकों का कहना है कि भीड़ नियंत्रित हो, किसी संदिग्ध या आपत्तिजनक व्यक्ति/वस्तु का प्रवेश न हो सके।
  • व्यवस्था लागू करने वालों के अनुसार, महिला सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता है।

क्या कहा प्रशासन और विरोधियों ने?

  • प्रशासन द्वारा गरबा आयोजकों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि बिना आईडी किसी को भी प्रवेश न दिया जाए और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई हो।
  • विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों ने इस पर धार्मिक भेदभाव और समाज को बांटने की राजनीति करार दिया है। उनका कहना है कि यह भारत की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति के खिलाफ है और इससे सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है।

ज़मीन पर हालात

  • कई जगहों पर पोस्टर लगाए गए हैं– “आईडी कार्ड दिखाएं और केवल हिंदू ही प्रवेश पाएं”, साथ ही ‘गैर-हिंदू नो एंट्री’ जैसे फरमान जारी किए गए हैं।
  • जो लोग नियम तोड़ेंगे, उनके खिलाफ आयोजक, पुलिस या अन्य संस्थाएं कार्रवाई करेंगी।
  • उज्जैन समेत अन्य जिलों में गरबा खिलाड़ियों को तलवार के साथ प्रशिक्षण तक दिया जा रहा है।

धार्मिक सिद्धांत और विवाद की दिशा

  • जहां समर्थकों के लिए ये सांस्कृतिक सुरक्षा का मामला है, वहीँ आलोचकों के अनुसार यह धार्मिक स्वातंत्र्य और एकता के मूल सिद्धांतों को चोट पहुँचाता है।
  • सेक्युलर कहे जाने वाले देश में ऐसे धार्मिक ‘प्रूफ’ या गंगाजल, तिलक, पूजा जैसी शर्तें विवाद को और गहरा कर रही हैं।

निष्कर्ष :-

गरबा महज एक धार्मिक उत्सव नहीं, सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक भी है। लेकिन आईडी कार्ड, गंगाजल, तिलक, कलावा, पूजा व ‘नो एंट्री’ जैसे नियमों से यह त्योहार आज सियासत, असुरक्षा और असहमतियों के घेरे में आ गया है। जनमत इस मुद्दे पर बंटा हुआ है, कुछ इसे धार्मिक सुरक्षा तो कुछ सांप्रदायिकता की जड़ मान रहे हैं।

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